ओम श्री सदगुरुदेव भगवान की जय
बंधुओं
आज हम श्रीमद्भगवद्गीता के भाष्य यथार्थ गीता का अध्ययन करेंगे और गीता के सार और उस में निहित रहस्य को जानने का प्रयास करेंगे
चलिए आप जानते हैं गीता की शुरुआत कैसे होती है पहले ही श्लोक में धृतराष्ट्र ने संजय से पूछा संजय धर्म क्षेत्र और कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र मेरे और पांडू पुत्रों ने क्या किया
धृतराष्ट्र अज्ञान है और संयम ही संजय है अज्ञान से आवृत मन ही धृतराष्ट्र है संयम के माध्यम से यह यह जान पता है कि परमात्मा ही सत्य है लेकिन अज्ञान से उत्पन्न मुंह रूपी दुर्योधन जब तक जीवित है तब तक इसकी दृष्टि सदा कौरवों पर ही रहती है
शरीरे क्षेत्र है जब हृदय देश में दैवीय संपद का बाहुल्य होता है तो यह शरीर धर्म क्षेत्र बन जाता है जब आसुरी संपत का बाहुल्य होता है यह शरीर ही कुरुक्षेत्र बन जाता है
2. संजय बोले राजा दुर्योधन ने व्यूहरचना युक्त पांडवों की सेना को देखकर द्रोणाचार्य के पास जाकर आता है यहां द्वैत का आचरण ही द्रोणाचार्य है जब यह जानकारी हो जाती है हम अलग और परमात्मा अलग हैं वहां उसकी प्राप्ति के लिए तड़प पैदा होता है तो मुंह मुंह रूपी दुर्योधन सभी दुखों का कारण है यह मूवी हमें प्रकृति की तरफ खींचता है पांडवों की सेना को देख कर के अर्थात पुण्य से प्रवाहित सजातीय मृत्यु को संगठित देख कर के मुंह रूपी दुर्योधन ने जा करके बोला
3. आचार्य अपने बुद्धिमान शिष्य द्रुपद पुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहकार खड़ी की हुई पांडू पुत्रों की इस भारी सेना को देखिए
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