Saturday, September 15, 2018

मानव तन की सार्थकता हमारा जीवन सार्थक कैसे बनाएं

सुख रहित क्षणभंगुर किंतु दुर्लभ मानव तन को पाकर मनुष्य को ईश्वर का चिंतन करना चाहिए जिससे शाश्वत सुख और परम शांति को मनुष्य प्राप्त कर लेगा।

Monday, September 10, 2018

मनुष्य पाप कैसे करता है तथा पाप से बचने का उपाय

   ओम श्री सदगुरुदेव भगवान की जय

बंधुओं,

      आज हम अपने इस आर्टिकल में यह जानने का प्रयास करेंगे कि हम मनुष्य किसकी प्रेरणा से पाप का आचरण करते हैं?

      अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्याय के 36 में श्लोक में यह प्रश्न किया की श्री कृष्ण यह पुरुष बरबस घसीटकर लगाए हुए के सदृस ना चाहता हुआ किसकी प्रेरणा से पाप का आचरण करता है!

   भगवान श्री कृष्ण ने कहा अर्जुन यह जो रजो गुण हैं
इस रजोगुण से उत्पन्न यह काम और क्रोध अग्नि के समान भोग भोगने से भी तृप्त  नहीं होते  काम क्रोध राग द्वेष के ही पूरक हैं यह दोनों अपने शत्रु हैं जैसे धुएं से अग्नि और मल से दर्पण थक जाता है जैसे-झिल्ली से गर्भ ढका हुआ है ठीक वैसे ही काम क्रोध आदि विकारों से यह ज्ञान ढका हुआ है भीगी लकड़ी जलाने पर धुआं ही धुआं होता है अग्नि रहकर भी लपट का रूप नहीं ले पाती मल से  दर्पण ढकने पर जिस प्रकार प्रतिबिंब स्पष्ट नहीं होता झिल्ली के कारण जिस प्रकार गर्भ ढका रहता है वैसे ही इन विकारों के रहते परमात्मा का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता

अर्जुन अग्नि के समान भोगों से न तृप्त होने वाले ज्ञानियों के निरंतर बैरी इस काम से ज्ञान ढका हुआ है।

       इंद्रियां मन और बुद्धि इन विकारों के वास स्थान हैं, यह काम मन और बुद्धि और इंद्रियों के द्वारा विज्ञान को अच्छादित करके जीवात्मा को मोह में डालता है अर्जुन पहले इंद्रियों को संयमित करो क्योंकि शत्रु तो इन्द्रियों के अंतराल में छिपा है वह तुम्हारे भीतर है बाहर खोजने से नहीं मिलेगा इंद्रियों को वश में करके ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले इस पापी काम को खत्म करो अतः विकारों के निवास स्थान का वही घेराव कर लो इंद्रियों को संयमित कर लो इस पर से भगवान कृष्ण बोले शरीर से इंद्रियों को परे और बलवान जान इंद्रियों से परे मन है यह उन से भी बलवान है मन से परे बुद्धि है और जो बुद्धि से परे अत्यंत पर है वह तुम्हारी आत्मा है वही तुम हो इसलिए इंद्रियां मन और बुद्धि का निरोध करने में सक्षम हो इस प्रकार बुद्धि से परे अर्थात सूक्ष्म और बलवान अपने आत्मा को जानकर आत्मा को समझकर बुद्धि के द्वारा अपने मन को वश में करके अर्जुन कामरूपी शत्रु को मार  जिससे पाप का शमन करके तू अपने स्वरूप को पा जाएगा।

ॐ तत् शत्

Shri Parammhans ashram badalapur photo from facebook

 Deena nath baba ji
 Pujya श्री परमहंस स्वामी श्री सच्चिदानंद जी महाराज
 दीनानाथ बाबा स्वामी नवीनानंद

Sunday, September 9, 2018

आध्यात्मिक चिंतन की सही दिशा

सदगुरुदेव भगवान की जय

आप सभी का स्वागत है हमारे इस ब्लॉग में अध्यात्म एक गंभीर विषय है मनुष्य का से गहरा जुड़ाव है मनुष्य और मानव समाज में बहुत सारे अध्यात्म को लेकर के मतभेद हैं लोग कहते फिरते हैं की अनूप इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र हैं  जब मैं उनसे बात कर रहा था तब उन्होंने अध्यात्म को लेकर के बहुत सारी टिप्पणियां की आखिर क्या मतलब है क्षेत्र में क्यों पड़े हो उनका कहना था और कोई ऐसा मानते हैं की मैं जो कर रहा हूं सही कर रहा हूं बाबा का क्या मतलब है और जिंदगी ऐसे जियो मौज लो आनंद करो खूब पैसे कमाओ और एक बंधु पुणे शहर के एक प्रतिष्ठित बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत है उन्होंने कहा मुझे तो बस पैसे कमाने है अब क्या पैसा ही सुख देता है मैं यही सोच रहा हूं पैसा आवश्यकता पूरी करता जरूर है पैसे की आवश्यकता है पैसे के बिना आज के समाज में बहुत सारी आवश्यकताएं पूरी नहीं हो सकती जहां देखिए वहां मनुष्य अपनी कामनाओं को अपनी आकांक्षाओं को उसी की पूर्ति में लगा हुआ है वह यह नहीं जानता कि मैं कामनाओं को नष्ट भी कर सकता हूं कामनाओं को का नाश संतोष से होता है कामनाओं का त्याग करना पड़ता है अपनी इच्छाओं को मारना पड़ता है तभी हम परम आनंद को उपलब्ध हो सकते हैं कहते हैं मन मरा माया मरी हम सा बेपरवाह जा का कठिन चाहिए सोई शहंशाह

उन्हें यह नहीं मालूम मनुष्य का जीवन बड़े भाग्य से मिलता है फिर न जाने हमें कितनी योनियों में भटकना पड़ सकता है कितने शरीर की यात्रा करनी पड़ सकती है कभी भी यह नहीं समझते कि बुद्ध ने महावीर ने स्वामी विवेकानंद ने अपने को जाना आत्मसाक्षात्कार किया जिससे आज संपूर्ण विश्व उनकी पूजा कर रहा है इस लोक में और परलोक में भी अगर किसी को शासकीय है उसे आध्यात्मिक और आध्यात्मिकता को समझना ही पड़ेगा अध्यात्म कोई बाहर की वस्तु नहीं है कि बाबा हो गए अध्यात्म का क्या मतलब है अध्ययन इसका आत्मा का अध्ययन ही अध्यात्म अध्यात्म ही नित्य शाश्वत है और सनातन थोड़ा सा जब हम श्रीमद्भगवद्गीता का रामचरितमानस का अध्ययन करेंगे स्वाध्याय करेंगे संत सद्गुरु की शरण में जाएंगे तभी हम कुछ आध्यात्म को जान सकते हैं अध्यात्म क्या है अद्भुत क्या है गीता में इस पर चर्चा करें भगवान से पूछा था इस चीज को आप परमहंस स्वामी नंद जी महाराज ने आदेश से ईश्वर के संरक्षण में लिखा

परम पूज्य स्वामी श्री सच्चिदानंद जी महाराज का नए विरक्त साधकों के लिए संदेश

           ओम श्री सत गुरुदेव भगवान की जय
                   ओम श्री परमात्मने नमः

हरी ॐ,     
      बड़ा भारी पुण्य इकट्ठा हुआ कि आप सभी नये साधको को संसार के मायिक जंजाल से निकाल लिया है बचा लाया यह पुण्य जब आप यहां से पुनः माया के तरफ चले जाएँगे तो बुरे फँस जाएंगे उसी माया के दल दल में, पुण्य  चले जाएंगे तो आप फिर उसी माया माया के दलदल में पहुंच जाएंगे तो अब आप आ गए हैं यहां आश्रम में इतना आनंद कहीं संसार में है अपने से खाना मिल जाता है दूसरे आश्रमों में जाओगे तो भिक्षाटन करके लाना पड़ेगा
, मांगना पड़ेगा कहीं काम करना पड़ेगा , नौकरी किसी की सेवा करनी पड़ेगी तब कुछ दो रोटी मिलेगी यहां आप लोगों को क्या कुछ करना पड़ता है यहां तो बस आश्रम कि केवल सेवा है कुत्ता भी पूछ से झाड़ू लगा लेता है |तब बैठता है इतनी सेवा कोई सेवा है,
जो आश्रम चला रहे हैं बाबा लोग जो व्यवस्था देख रहे हैं,, वह जो कहे उनका आदेश मानो और हमारा कहना है
जैसे ही सो कर उठो तुरंत भगवान का नाम लेना प्रारंभ कर दो ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम राम-राम राम-राम राम-राम राम-राम राम-राम राम-राम राम-राम राम-राम राम-राम इसका खूब अभ्यास डालो
इधर उधर से मन को हटाओ हां जो तुम्हारा पुराना संस्कार है ना तो तुम्हारे गांव की तुम्हारे बेटे की तुम्हारे पत्नी की याद तुम्हें आएगी उसको तुम हटाओ समझ गए उसको तुम्हें भूलाना है जब जब तुम्हें याद आवे तब तब उसे भूलाते जाओ इधर भगवान की तरफ लगाते जाओ गुरु बाबा मिल गए तो एक प्रकार से साधक अपना मन गुरु बाबा को दे दिया है शिष्य का मतलब है कि हमने अपना मन महाराज जी को दे दिया अब यह मन हमारा ना रहा
अब जो गुरु बाबा कहै वह करें ठीक है समझ रहे हो ना तुम अपना मन का कहना ना करो अब यह मन हमारा हो गया ना अब हम जो कहेंगे वह तुम्हें करना पड़ेगा |अभी  तुम लोगों का मन हमारा हो गया अब हम जो कहेंगे जो सेवा बताएंगे वह तुम लोगों को करना पड़ेगा
  सेवा करना है भजन करना है  , शरीर के पाप सेवा से  मन के पाप भजन से कट जाएंगे । जब एकात बैठे हो तो कभी घर की याद आने लगे लड़कियों की याद आने लगे तो उन सबके साथ में रहे हैं आखिर उनकी याद हमें क्यों आ रही है क्या बात है क्योंकि हम उनके साथ रहे हैं उनके संस्कार हैं उसी दुश्मन को खत्म करना है जैसे ही याद आ जाए कि महाराज जी ने क्या बताया है कि उधर मन ना जाने पाए इसलिए तुरंत सावधान हो जाओ मन को लगा दो भजन में ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम उसी समय लिखने में लगा दो ओम ओम ओम ओम ओम सेवा में लगा दो सेवा करना भजन करना है

     भजन जब हम राम राम ओम ऊं जपेंगे तो वह वायुमंडल में चला जाएगा आकाश में चला जाएगा जहां राम का स्वरूप होगा उसे वह पकड़े पकड़ेगा जब तुम जपोगे राम राम गए थे वह राम को बुला देगा। 
  अगर 50000000  (5  करोड़) नाम लिया जाए तो अनहद द्वार खुल जाएगा हम लोगों ने लिया है और करके देखा है तुम लोगों को भी करना है, तुम लोगों के मन में आता है ना कि महाराज जी की शरण में आए हैं और महाराज जी कुछ बताते बताते नहीं हैं, सेवा करना शरीर का काम है मन का काम है भगवान का नाम लेना ओम ओम ओम ओम
  सब की आज्ञा पालन करना नाराज मत होना जब तुमको घर की याद आएगी याद मत करो हमको देखो हमारे स्वरूप को देखो हमें हृदय में बैठा लो हमारा ध्यान करो समझ में आ रहा है जैसे फोटो है ना देख रहे हो ना ऐसे देखते देखते आंखें बंद ना हो देखते देखते खूब देखो देखना है धीरे-धीरे वह फोटो अंदर आ जाएगा फिर देखते-देखते आंखे बंद करो फिर इधर से उधर देखो जिधर ध्यान में अभ्यास करो ठीक है यहां सब ठीक है|




स्वामी जी के उपदेश से संकलित



Saturday, September 8, 2018

श्रीमद् भागवत गीता अध्ययन सार व चिंतन प्रथम अध्याय

ओम श्री सदगुरुदेव भगवान की जय

बंधुओं

आज हम श्रीमद्भगवद्गीता के भाष्य यथार्थ गीता का अध्ययन करेंगे और गीता के सार और उस में निहित रहस्य को जानने का प्रयास करेंगे

चलिए आप जानते हैं गीता की शुरुआत कैसे होती है पहले ही श्लोक में धृतराष्ट्र ने संजय से पूछा  संजय धर्म क्षेत्र और कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र मेरे और पांडू पुत्रों ने क्या किया

धृतराष्ट्र अज्ञान है और संयम ही संजय है अज्ञान से आवृत मन ही धृतराष्ट्र है संयम के माध्यम से यह यह जान पता है कि परमात्मा ही सत्य है लेकिन अज्ञान से उत्पन्न मुंह रूपी दुर्योधन जब तक जीवित है तब तक इसकी दृष्टि सदा कौरवों पर ही रहती है

शरीरे क्षेत्र है जब हृदय देश में दैवीय संपद का बाहुल्य होता है तो यह शरीर धर्म क्षेत्र बन जाता है जब आसुरी संपत का बाहुल्य होता है यह शरीर ही कुरुक्षेत्र बन जाता है

2. संजय बोले राजा दुर्योधन ने व्यूहरचना युक्त पांडवों की सेना को देखकर द्रोणाचार्य के पास जाकर आता है यहां द्वैत का आचरण ही द्रोणाचार्य है जब यह जानकारी हो जाती है हम अलग और परमात्मा अलग हैं वहां उसकी प्राप्ति के लिए तड़प पैदा होता है तो मुंह मुंह रूपी दुर्योधन सभी दुखों का कारण है यह मूवी हमें प्रकृति की तरफ खींचता है पांडवों की सेना को देख कर के अर्थात पुण्य से प्रवाहित सजातीय मृत्यु को संगठित देख कर के मुंह रूपी दुर्योधन ने जा करके बोला

3. आचार्य अपने बुद्धिमान शिष्य द्रुपद पुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहकार खड़ी की हुई पांडू पुत्रों की इस भारी सेना को देखिए

क्या आपको शेयर मार्केट में जाना चाहिए

लोग अधिक धन कमाने के लोग हमें हंसकर शेयर मार्केट में जाते हैं जहां अपनी गाढ़ी कमाई या कर्ज लेकर के पैसे को लगाते हैं क्या सभी लोग सफल होते ह...