प्रत्येक व्यक्ति अधिक से अधिक सुख प्राप्त करने की आकांक्षा रखता है आपको भी यदि सुखी रहना है तो सबसे पहले इच्छाओं का त्याग और संतोष संतोष का अर्थ आपको शायद ना पता हो संतोष वास्तव में सम रहना और जो कुछ भी मिल जाए उसी में संतुष्ट हो जाना ही संतोष है अब आप कहेंगे कि क्या हम पुरुषार्थ ना करें मेरा मानना है कि आपको पुरुषार्थ करना चाहिए आप खूब प्रसाद करिए कि नहीं जो कामनाएं हैं जो अपेक्षाएं हैं जो मन को फंसा करके रखती हैं उसे हमें त्याग नहीं होगा चाहे आपको कोई भी पहले हां अपना जैसे ही पूरी होगी आपको कुछ तो आनंद मिलेगा लेकिन हमेशा के लिए आनंद चाहते हैं तो कामनाओं को छोड़ना होगा हां आप दूसरा तरीका या अपना सकते हैं कि आप अपनी आवश्यकताओं को सीमित करिए सीमित कैसे करेंगे जो अनावश्यक चीजें हैं उसको मत खरीदिए उसकी इच्छा मत करिए हां दूसरी चीज जिससे आपका जन हो उस पर करिए और अपनी सेहत का ध्यान रखें ध्यान करिए कुछ करिए तो आपका जीवन हां सकते हैं
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